23 नवम्बर, वर्धा से गये एक जांचदल,
जिसमें महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के अध्यापक, छात्र, वर्धा
के सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार सम्मिलित थे, ने अकोट (जिला अकोला) का दौरा
किया। पिछले 23 अक्टूबर को अकोट ताल्लुका में साम्प्रदायिक हिंसा की घटना हुई थी जिसमें 4 लोग
मारे गये थे एवं कई लोग घायल हुए थे। मुस्लिम समुदाय के 22 घरों को आग के हवाले कर
दिया गया था और लगभग 25 दुकानों को जलाया गया था। मरने वालों में सभी निम्नमध्यवर्गीय
पृष्ठभूमि से थे।
साम्प्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि :
साम्प्रदायिक
हिंसा की पृष्ठभूमि 19 अक्टूबर को तैयार की जाती है। पूरे अकोट ताल्लुके में 65
मंडल देवी के लगाये गये थे। प्रत्येक मंडल का संबंध किसी न किसी जातीय समाज से
रहता है। मसलन माली समाज, कुनबी समाज, धोबी समाज आदि। धोबी और भोई समाज के एक मंडल,
जिसके कर्ताधर्ता बजरंग दल, शिवसेना, विश्व हिंदू परिषद के लोग थे, के पास से
निकलते हुए एक मुस्लिम बच्चे ने गलती से वहाँ पर थूक दिया। उसके साथ उसका हमउम्र
दोस्त भी था। उसका थूक देवी की प्रतिमा को छुआ तक नहीं लेकिन पर्दे पर उसके कुछ
छींटे जरूर पड़े। उस बच्चे को मंडल के लोगों ने पकड़ लिया और उसकी पिटाई करने के
बाद वहीं पर बैठा लिया। इतनी देर में जब कुछ शोर-शराबा हुआ तो लोगों की भीड़ वहाँ
पर एकत्र हुई और मामले को समझने के लिए शोएब नाम का व्यक्ति भी वहाँ पर पहुँचा और
उसने कुछ हस्तक्षेप भी किया और मंडल के लोगों को समझाने की भी कोशिश की। उसने बच्चे
की उम्र का भी हवाला दिया। बच्चे की उम्र 7-8 साल की थी। मंडल के लोगों की तरफ से
यह भी कहा गया कि आज ये देवी की प्रतिमा पर थूक रहे हैं कल हमारे मुँह पर थूकेंगे।
बहरहाल शोएब ने किसी तरह से मामले को शांत कराया और बच्चे को मंडल के लोगों से
मुक्त कराया। इस घटना की चर्चा लगभग आधे घण्टे के बाद आस-पास के इलाके में फैल
चुकी थी। एजाज नामक टेलर जिसकी घटना स्थल से कुछ दूर पर ही दुकान थी मंडल के
लोगों के पास आया और उसने जानना चाहा कि मामला क्या है और उसके बाद वह भी लौटकर
अपनी दुकान पर वापस आ गया।
लगभग
आधे घण्टे के अन्दर पुलिस एजाज की दुकान पर पहुँचती है और बच्चे के बारे में
पूछती है कि वो कौन है, कहाँ से है आदि। एजाज को घटना की जानकारी थी लेकिन बच्चे
कौन है इसकी जानकारी नहीं थी और इस वजह से उसने पुलिस के सामने बच्चों के नाम और
पते के बारे में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी और पुलिस वहाँ से चली गयी। आधे घण्टे
के बाद पुलिस फिर से वहाँ पर आती है और एजाज से पूछताछ करती है। इस बार भी एजाज के
द्वारा बच्चो के नाम और पते पर असमर्थता जाहिर करने पर पुलिस उसे थाना अकोट ले
जाती है। इस बीच अकोट से आमदार (विधायक) संजय गावंडे (शिवसेना) थाने के बाहर दल-बल
के साथ पहुँच जाते हैं उनके समर्थकों में बजंरग दल, विश्व हिन्दू परिषद, छावा
संगठन के लगभग 250 से 300 लोग थाने में जुटते हैं और नारेबाजी शुरू हो जाती है।
उनकी स्थानीय पुलिस अधिकारियों से काफी तू-तू मैं-मैं थाने में होती है। आमदार और
उनके समर्थकों के दबाव के चलते कि 'बच्चों को हाजिर किया जाये', पुलिस के द्वारा
एजाज की पिटाई की जाती है (बाजीराव पट्टे से)। लगातार बढ़ते दबाव के चलते पुलिस
थाने में शोएब को हाजिर करती है और शोएब बच्चों का नाम एवं पता पुलिस के सामने
जाहिर कर देता है। पुलिस तुरन्त ही बच्चों को उनके वालिद के साथ थाने में हाजिर
कर देती है।
बच्चों के थाने में आते ही उनकी उम्र
देखकर वहाँ मौजूद पुलिस के आलाधिकारी ये कहते हैं ये बच्चे तो खुद ही भगवान का
रूप हैं और इन्होंने जानबूझकर नहीं बल्कि गलती से ही थूका है। आमदार महोदय भी बच्चों को देखकर ढीले
पड़ जाते हैं और तुरन्त एक नया पैंतरा खेलते हैं कि बच्चे तो मासूम हैं लेकिन सूत्रधार कोई और है और आप लोग जल्दी से
जल्दी उस मुख्य अभियुक्त को पकडि़ये जिन्होंने देवी का अपमान करवाया है और यह
कहकर दल-बल के साथ वापस चले जाते हैं। पुलिस रातभर थाने में शोएब और एजाज को रखती
है और उन पर धारा 107 लगायी जाती है । अगले दिन वे दोनों जमानत पर रिहा होते हैं।
शोएब का गुनाह यह था कि उसने मामले को शांत कराया था एवं एजाज घटना स्थल पर मामले
को समझने के लिए पहुँचा था। शिवसेना के विधायक और हिंदू साम्प्रादायिक संगठनों के
लोगों की 'भावनाओं' को संतुष्ट करने के लिये दो बिलकुल निर्दोष लोगों को बलि का
बकरा बनाया गया। बहराल यह 19 अक्टूबर का घटना क्रम था और इसके बाद मामला शांत हो
गया था लेकिन इस शांति के बावजूद मुस्लिम समाज में काफी दहशत व्याप्त हो गयी थी।
तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम :
21 अक्टूबर को अकोट ताल्लुका में नगर पालिका
की एक सीट के लिये उपचुनाव था। अकोट ताल्लुका में कुल 31 सीटें हैं जिसमें दिसम्बर,
2011 को मतदान हुआ था। विजयी प्रत्याशियों में 2 सीट शिवसेना एवं 2 सीटें भाजपा
के खाते में गयी थीं। जिसमें 1 सीट वार्ड क्रमांक 5 में मनोज रघुवंशी की पत्नी ज्योति
मनोज रघुवंशी शिवसेना से चुनकार आयी थी कांग्रेस से मुस्लिम महिला उम्मीदवार जो
चुनाव हार गयी थी, ने मनोज रघुवंशी की पत्नी की जीत के
खिलाफ न्यायलय में चुनौती दी थी। कांग्रेस की प्रत्याशी के पास आधार यह था कि
मनोज रघुवंशी के दो से ज्यादा बच्चे हैं (महाराष्ट्र में यह नियम है कि जिनके
2001 के बाद से 2 से ज्यादा बच्चे हैं वह किसी भी तरह का चुनाव नही लड़ सकता
है।) कांग्रेस की प्रत्याशी की चुनौती वाजिब थी और जब जांच हुई तब यह पाया गया कि
उनके दो से ज्यादा बच्चे हैं और उनकी जीत को निरस्त कर दिया गया। इस बार उस सीट
पर चुनाव के लिये मनोज रघुवंशी के परिवार से शिवसेना प्रत्याशी मनीषा राहुल रघुवंशी
और कांग्रेस से सलमा निशात प्रत्याशी थीं। चुनाव का परिणाम घोषित होने पर शिवसेना को वह
सीट गंवानी पडी और कांग्रेस की प्रत्याशी उस सीट पर चुनाव जीत गयी।
1989 से संपन्न हुए अभी तक विधानसभा के
05 चुनावों में 04 बार शिवसेना प्रत्याशी ही विजयी हुए हैं और 2014 में लोकसभा
तथा महाराष्ट्र के विधानसभा के चुनाव भी होने हैं। शिवसेना से वर्तमान विधायक संजय गावंडे 3 साल के
अपने कार्यकाल के दौरान अकोट की जनता के बीच में काफी अलोकप्रिय साबित हो चुके हैं, जिसकी परिणति पिछले साल सम्पन्न हुए नगर पालिका के चुनाव में भी देखने
को मिली और केवल 2 सीटें ही शिवसेना को मिली। हालिया नगर पालिका के उपचुनाव में
संजय गावंडे की अलोकप्रियता के चलते ही वह सीट शिवसेना को गवानी पड़़ी।
23 अक्टूबर का घटनाक्रम :
19
अक्टूबर की घटना के बाद से ही पूरे नगर में यह अफवाह थी कि देवी विसर्जन के
कार्यक्रम के दौरान जो यात्रा निकलेगी उसमें मुस्लिम समुदाय के लोग कुछ न कुछ
गड़बड़ी करेंगे। मसलन यह भी अफवाह थी कि मुसलमानों ने ढेर सारे पत्थर इक्ट्ठा कर
के रखें है जो विसर्जन के कार्यक्रम के दौरान देवी पर चलाये जाएंगे। इस अफवाह को
फैलाने में साम्प्रदायिक संगठनों के साथ-साथ स्थानीय दुकानदारों, छोटे व्यापारियों
की भी बड़ी भूमिका थी।
23
अक्टूबर को देवी विसर्जन का कार्यक्रम था। देवी विसर्जन के कार्यक्रम के लिये यात्रा
निकलनी थी और जिसमें नगर के सैकडों लोगों को शामिल होना था। प्रशासन ने सख्त इंतजाम
किये थे। मसलन हर वो इलाका जहाँ से यात्रा को निकलना था और यदि वहाँ पर कोई मस्जिद
है या मुस्लिम बस्ती है तो 'बेरिकेटिंग' का भी इन्तजाम किया गया था और भारी
मात्रा में पुलिस बल तैनात किया गया था।
देवी
विसर्जन के कार्यक्रम के लिये लोग जुलूस में जा रहे थे। अचानक ठीक उसी जगह के पास
जहाँ पर बच्चे के थूकने की घटना हुई थी एक मंडल के लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया
कि पत्थर आया और हमको पत्थर आकर लगा। पुलिस ने तुरंत आस-पास देखा लेकिन कहीं से
कोई पत्थर नहीं आया था और फिर से जुलूस को आगे बढ़ाया गया। पत्थर आने की सूचना
आग की तरह फैली और कुछ भगदड़ भी मची लेकिन पुलिस ने स्थिति पर पूरी तरह से
नियंत्रण कर लिया। (पुलिस के आलाधिकारियों से जांचदल ने मिलकर यह जानने की कोशिश
भी की थी कि क्या कोई पत्थर आया था अथवा पत्थर से हमला हुआ था तो उन्होंने कहा
कि कोई पत्थर नहीं आया यह केवल अफवाह थी)।
हिंसा का दौर :
देवी विसर्जन का कार्यक्रम चल रहा था कि
लगभग 7-8 बजे नगर के बिल्कुल बाहरी इलाके और एक तरह से मलिनबस्ती बरडे प्लाट
में जहाँ पर ज्यादातर मुस्लिम समाज और बारी समाज के लोग रहते हैं। दंगाइयों ने
हमला कर दिया। दंगाइयों ने मुसलमानों के 22 घरों[1]
को जलाया और दो लोगों की हत्या कर दी। हाजी मुहम्मद यासीन (उम्र लगभग 80 साल) जो
कि फालिज के शिकार थे और भाग नहीं पाये, दंगाइयों ने उन्हें मार दिया। उनको बचाने
के लिये उनकी पत्नी जुलेखां बी (उम्र लगभग 75 साल) के पैर पर दंगाइयों ने धारदार
हथियार से हमला किया और उनको मारने के लिये लोहे की रॉड का इस्तेमाल किया गया, जिसके चलते वो बुरी तरह जख्मी हुई और बेहोशी की हालात में ही उनको
अकोला के सरकारी अस्पताल में भर्ती किया गया। 16 साल का एक लड़का मोहम्मद
जफरूद्दीन जो थोडी देर पहले ही काम पर से लौटा था दंगाइयों ने उसकी भी हत्या कर
दी। जांच दल जब पीडि़त व्यक्तियों से मिला तो उन्होंने बताया कि दंगाइयों के पास
मशाल, लोहे के पाइप, तलवारें, मिट्टी का तेल मौजूद था। जांच दल को मुस्लिम
समुदाय के जले हुए घरों से छोटी-छोटी शीशियां मिली जिसमें केमिकल भर कर हर घर में
फेंका गया था और जिसकी तैयारी पहले से ही दंगाइयों ने की थी।
घटना के कुछ देर के बाद पुलिस भी वहाँ पर
पहुँचती है और चीजों को नियंत्रित करने की कोशिश करती है जिसके जवाब में हिन्दू
साम्प्रदायिक तत्वों की तरफ से पुलिस पर भी हमला होता है और पुलिस के जवानों को
भी चोट आती है। साम्प्रदायिक तत्व फायर बिग्रेड की गाड़ी को भी उस इलाके में
जाने से रोकते हैं, जहाँ पर दंगाइयों ने मुसलमानों के घरों
में आग लगाई थी। पुलिस के मुताबिक हमलावरों में से एक व्यक्ति योगेश महादेवराव
रेखाते (उम्र 23 साल) जो मुस्लिम बस्ती में काफी अन्दर तक आ गया था मारा जाता
है। मुस्लिम समुदाय की तरफ से जवाबी कार्रवार्इ में 24 अक्टूबर की सुबह मनोहर राव
बुधे (कासार समाज से उम्र 82 साल) की हत्या कर दी जाती है। 24 अक्टूबर शाम छ:
बजे कर्फ्यू के दरम्यान मुसलमानों की आठ दुकानें एवं 1 हिन्दू की भंगार (कबाड़)
की दुकान में आग लगाई जाती है एवं सब्जी मण्डी में 5 दुकाने मुस्लिम समुदाय की
तथा 9 दुकाने हिन्दू समुदाय की आग के हवाले कर दी जाती है।[2]
(पुलिस की तरफ से अभी तक दोनों समाज के लोगों में से लगभग 50-50 लोगों को छोटी तथा
बड़ी धाराओं के अन्तर्गत पकड़ा गया है।)
हिंदू साम्प्रदायिक
ताकतों की दंगे में भूमिका :
जांच दल के लोगों ने जब पीडि़त व्यक्तियों
से मुलाकात की और हमलावरों की पहचान के बारे में जानना चाहा तो मालूम पड़ा कि हमलावरों
में ज्यादातर बारी समुदाय (हिंदू, ओ.बी.सी.) और बाहर के लोग थे। पूरे अकोला जिले में पान का
जो भी उत्पादन होता है वह बारी समाज के लोगों के द्वारा ही होता है। बारी समाज का
बड़ा हिस्सा आज भी निम्न-मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि से आता है और बारी समाज में
शिक्षा का अभाव भी व्यापक स्तर पर है। बारी समाज के प्रभावशाली नेता महादेवराव
बोड़के जो दिवंगत हो चुके हैं RSS के थे। गजानन माकोड़े (बारी) बजरंग दल के
नगराध्यक्ष, अनन्त मेषाण, शिवसेना नगर अध्यक्ष एवं अन्य साम्प्रदायिक संगठनों
के प्रमुख पदों पर बारी समाज के लोग हैं। बारी समाज परम्परागत रूप से शिवसेना के
साथ है। अकोट में जिस इलाके से दंगे की शुरूआत हुई वहाँ पर मुस्लिम और बारी दोनों
समाज के लोग बिलकुल आस-पास रहते हैं और दोनों की बस्तियाँ आपस में बिलकुल सटी हुई
हैं। 1999 में एक साम्प्रदायिक तनाव की घटना अकोट में हुई थी और बीचो-बीच बाजार
में भगदड़ मची थी, जिसमें भगदड़ के कारण बारी समाज का एक
बुजर्ग 80-85 साल का मारा गया था। इस घटना को साम्प्रदायिक संगठनों ने एक राजनीतिक
रूप दे दिया था। इस घटना ने साम्प्रदायिक संगठनों को पूरे बारी समुदाय को साम्प्रदायिक
चेतना से लैस करने में बड़ी मदद की और इस बार के दंगे में भी साम्प्रदायिक ऐजेण्डा
को पूरा करने के लिए बारी समुदाय को मुसलमानों के खिलाफ 'टूल' के रूप में इस्तेमाल
किया गया।
जांचदल ने हिंदू समुदाय के लोगों से मिलकर
घटना के कारणों को जानने की तथा दंगे के दरम्यान उनकी मानसिकता को समझने की कोशिश
की तो यह मालूम पड़ा कि किसी भी व्यक्ति को कोई ठोस औार यथार्थपरक जानकारी नहीं
है। बल्कि अफवाहों के चलते पूरा समुदाय घटना के लिये मुस्लिम समुदाय को ही जिम्मेदार
मानता है। मसलन जानबूझ कर देवी की प्रतिमा को अशुद्ध किया गया, देवी पर पत्थर
फेंके गये एवं पहले हमला मुसलमानों की तरफ से हुआ इत्यादि। लोगों से बातचीत के
क्रम मे ही जांच दल को यह भी मालूम पड़ा कि अकोला और अकोट दोनों ही जगह से मुस्लिम
युवकों की सिमी के नाम पर गिरफ्तारियां हुई थीं लेकिन उनमें से ज्यादातर बाइज्जत
बरी हो चुके हैं। लेकिन आतंकवाद और सिमी से जुड़े होने के चलते कुछ युवकों की हुई
गिरफ्तारी ने हिन्दू जनमानस में इस अफवाह को फैलाने में बड़ी मदद की कि जो दंगा
हुआ उसमें भी सिमी के लोगों का हाथ है। कुल मिलाकर सिमी से जुड़ी परिघटना को हिन्दू
साम्प्रदायिक तत्वों ने इस दंगे में खूब इस्तेमाल किया और समाज का साम्प्रदायिक
ध्रुवीकरण किया गया। ज्यादातर हिंदू लोग मुसलमानों को लेकर वहीं परंपरागत धारणा
बनाये हुए थे जिसका प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ करता है।
बाबरी मस्जिद के विधवंस के बाद से साम्प्रदायिक
तनाव की जो स्थिति यहाँ पैदा हुई तमाम सारे हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन मिलकर उस
तनाव को और बढ़ाने की कोशिश में जी जान से लगे हुए हैं और साम्प्रदायिक संगठनों
ने यहाँ पर अपने जनाधार का काफी विस्तार किया है। केवल अकोट ताल्लुका में ही
राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के 400 कैडर, विहिप के 150, बजरंग दल के 200, छावा
संगठन के 100, मराठा महासंघ के 150 कैडर प्रमुख रूप से साम्प्रदायिक ऐजेण्डे को गैर
संसदीय तरीके से आगे बढ़ाने में सक्रिय हैं। इसके अलावा चुनावी राजनीति के तहत
सक्रिय संगठनों में शिवसेना, भाजपा, नवनिर्माणसेना का भी पर्याप्त जनाधार है।
पूरे महाराष्ट्र में शिवसेना का सामाजिक
आधार अन्य पिछड़ा वर्ग में है। कांग्रेस में शुरू से मराठा समाज के लोग वर्चस्व
में रहे हैं पूरे महाराष्ट्र के अन्दर भी मराठाओं का वर्चस्व रहा है समाज के
पिछड़े वर्गों को आजादी के बाद कांग्रेस की नीतियों के चलते कोई 'स्पेस' नहीं
मिला। शिवसेना ने ही सबसे पहले अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को राजनीति में स्पेस
दिया। छगन भुजबल, जो पहले शिवसेना में थे और अब कांग्रेस में हैं और माली समाज से
आते हैं, उन्होंने यह सार्वजनिक रूप से कहा कि 'आज मैं जो कुछ भी हूँ बाल ठाकरे की
वजह से हूँ।'
जांच दल को अकोट के डिग्री कॉलेज के
प्राध्यापक ने बताया कि इस पूरे क्षेत्र में जहाँ पर भी मुस्लिम आबादी का अनुपात ठीक-ठाक
है वहाँ पर साम्प्रदायिक संगठनों ने अपने जनाधार को काफी मजबूत कर लिया है और सुनियोजित
तरीकों से बार-बार साम्प्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा की जाती है। साम्प्रदायिक
संगठन इस बात को हिन्दू समुदाय में ले जाते हैं कि यदि हिंदू एकजुट नहीं होगा तो
मुस्लिम हम पर भारी पड़ेगें। यह परिघटना पूरे देश के पैमाने पर भी देखने में सामने
आती है कि जहाँ-जहाँ मुस्लिम आबादी का प्रतिशत ठीक-ठाक होता है वहाँ पर अक्सर
हिंदू साम्प्रदायिक संगठनों की ओर से सुनियोजित तरीके से साम्प्रदायिक तनाव की
स्थिति पैदा की जाती है।
साम्प्रदायिक हिंसा का मुस्लिम समाज पर प्रभाव :
जांच दल ने मुस्लिम समुदाय, उनके नेताओं,
पीडित व्यक्तियों तथा सामान्य मुस्लिम नागरिकों
से भी बातचीत की। बातचीत के क्रम में ही यह तथ्य सामने आया कि मुस्लिम समुदाय
काफी दहशत में है। शिवसेना से विधायक संजय गावंडे एवं उनके समर्थकों पर पुलिस ने
थाने का घेराव करने के कारण कुछ हलकी-फुलकी धारायें लगायी हैं लेकिन दंगे की
पूर्वपीठिका को तैयार करने में जो भूमिका उनकी और उनके समर्थकों की रही है उसके
लिये न तो सरकार ने और न ही पुलिस ने कोई कड़ा कदम उठाया है। मुस्लिम समुदाय पहले
से और भी ज्यादा अपने में सीमित हुआ है। ऐसे समय में जो भूमिका सेकुलर राजनीति को
अख्तियार करनी चाहिए थी उसका पूरे महाराष्ट्र में अभाव दिखता है। प्रदेश में
कांग्रेस ने साम्प्रदायिक तकतों को काउन्टर करने के लिए हनुमान सेना का गठन किया
है। (दैनिक भास्कर 24 अक्टूबर, 2012
''हनुमान सेना को लेकर राजनीतिक हलचल'' के शीर्षक से एक खबर प्रकाशित हुई है - “बजरंग दल के समानांतर कांग्रेस की हनुमान
सेना भाजपा के लिए सिरदर्द बन सकती है। शिवसेना के साथ भाजपा के संबंधों में मिठास
का पैमाना घटते जा रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि हनुमान सेना को हथियार बना
कर शिवसेना भाजपा को कुछ मामलों में नुकसान पहुंचा सकती है।.… बजरंग दल कार्यकर्ताओं के पाला बदलने की संभावना को देखते हुए पैनी नजर
रखी जा रही है।.… दो दिन पहले पूर्व नागपुर में हनुमान सेना
की घोषणा की गई। वित्त व ऊर्जा राज्यमंत्री राजेंद्र मुलक व शिवसेना के जिला
प्रमुख शेखर सावरबांधे की उपस्थिति में पूर्व मंत्री सतीश चतुर्वेदी ने कहा कि कांग्रेस
की हनुमान सेना जन विकास के मुद्दों पर आक्रामक भूमिका में रहेगी।…. लेकिन हनुमान सेना को लेकर कहा जा रहा है कि वह कांग्रेस के लिए ऐसा
विकल्प बनाने के उद्देश्य के साथ गठित की गई है, जिसमें बजरंगियों के अलावा
शिवसैनिकों का समायोजन किया जा सके।…. अब तक ये संगठन भाजपा के लिए मददगार बने
हुए हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से दोनों संगठन असंतोष के दौर से गुजर रहे हैं।…. बजरंगियों की शिकायत रहती है कि उन्हें अनुशासन के नाम पर सक्रिय कार्य
करने से रोका जा रहा है। भाजपा में पूछ-परख कम हो रही है। चर्चा है कि कुछ असंतुष्ट
कार्यकर्ताओं ने ही मोबाइल संदेश भेजकर बजरंगदल कार्यकर्ताओं से हनुमान सेना में
शामिल होने का निवेदन किया।'') ऐसे में ज्यादातर राहत का कार्य या जिनकी गिरफ्तारियाँ हुई हैं उनके
मुकदमें लड़ने के लिये वकील उपलब्ध कराने से लेकर आर्थिक मदद करने का काम धार्मिक
संगठनों की तरफ से ही हो रहा है, जिसके चलते तमाम तरह के इस्लामिक
धार्मिक संगठन मसलन जमात-ए-इस्लामी, अहले हदीस, अहले सुन्नतुल जमात, तब्लीग
जमात जो इस्लाम का प्रचार-प्रसार करने का काम करते हैं, उनके लिये अवसर बढ़ रहा है। मुस्लिम समाज का अपने में सीमित हो जाने के
चलते सबसे ज्यादा बुरा प्रभाव महिलाओं पर पड़ रहा है। मसलन केवल उन्हीं मुस्लिम
परिवारों की महिलायें घर से बाहर निकल पाती हैं जिनके घर में कोई मर्द नहीं है। शिक्षा
के अवसर भी मुस्लिम महिलाओं के लिये काफी सीमित हो गये हैं। जांच दल को मुस्लिम समुदाय
के लोगों से यह जानकारी मिली कि लगभग 20 साल पहले तक अकोट में मुस्लिम महिलाऐं भी
सिनेमा देखने जाया करती थीं। लेकिन जब से दंगे का दौर शुरू हुआ तब से महिलायें
सिनेमा देखने नहीं जाती हैं। कुल मिलाकर मुस्लिम महिलाओं के आवागमन को 90 के दशक
से ही काफी सीमित कर दिया गया है।
दंगे का नवउदारवादी आर्थिक पक्ष :
अकोट
में हुए दंगे में अफवाहों को फैलाने में छोटे-छोटे दुकानदारों से लेकर व्यापारियों
की एक बड़ी भूमिका रही है। नई आर्थिक नीतियों के तहत खुदरा बाजार में जो प्रत्यक्ष
विदेशी निवेश आ रहा है, जिससे देश भर का खुदरा व्यापार से जुड़ा व्यापारियों और
दुकानदारों का तबका खुद को काफी असुरक्षित महसूस कर रहा है। अकोट में साम्प्रदायिक
संगठनों ने छोटे-छोटे दुकानदारों और व्यापारियों के अन्दर व्याप्त इस असुरक्षाबोध
का फायदा इस रूप में उठाया कि केवल बीजेपी, शिवसेना या नवनिर्माण सेना जैसी
राजनैतिक शक्तियां ही उनके हितों की रक्षा कर सकती हैं और इसी के साथ वे इन तबकों
के बीच अपने साम्प्रदायिक ऐजेण्डे को ले गये। जहाँ कांग्रेस केंद्र और राज्य स्तर
पर उसको लागू करने के लिये उतावली है तो वहीं दूसरी तरफ बीजेपी केन्द्र में और
राज्य में भी विपक्ष में होने के चलते खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के
विरोध में हैं जबकि शिवसेना और नवनिर्माण सेना खुदरा बाजार में निवेश के समर्थन
में है लेकिन इस शर्त के साथ कि वॉलमार्ट जैसी कम्पनियों में केवल मराठा मानुष को
ही जगह अथवा रोजगार मिले।
विदर्भ देश का वह हिस्सा है जहाँ पर
सर्वाधिक किसानों ने आत्महत्यायें की है। नवउदारवादी नीतियों के चलते पूरे
विदर्भ में कृषि संकट और गहराया है। विदर्भ का एक बड़ा हिस्सा 90 के बाद से ही
साम्प्रदायिक तनाव को किसी न किसी रूप में देख रहा है। अकोला, बुलढाणा (खामगांव)
अमरावती के कुछ हिस्से तथा यवतमाल इन जिलों में साम्प्रदायिक ताकतों ने अपने जनाधार
को काफी मजबूत कर लिया है और इस पूरे इलाके में किसी तरह का कोई भी औद्योगिक विकास
न के बराबर है। पूरे महाराष्ट्र में मुंबई, नासिक, औरंगाबाद, पूणे, ठाणे को अगर
छोड़ दिया जाये तो अधिकांश जिलों की अर्थव्यवस्था में कृषि की प्रधान भूमिका है।
जैसे ही हमें या इस प्रदेश के बाहर के किसी व्यक्ति को यह सूचना मिलती है कि महाराष्ट्र
के किसी इलाके में दंगा हुआ तो अमूमन लोग इस भ्रम का शिकार हो जाते है कि यह एक
औद्योगिक रूप से विकसित प्रदेश है। लेकिन प्रदेश का अधिकांश हिस्सा आज भी प्राक्
औद्योगिक अवस्था से ही गुजर रहा है। विदर्भ में कपास की खेती के व्यापक पैमाने
पर होने के चलते ही यहाँ अकोला के साथ-साथ लगभग हर जिले में टेक्सटाइल मिले लगाई
गयीं थी जो अब पूरी तरह से बन्द हो चुकी हैं। विदर्भ के कुछ इलाकों जैसे नागपुर,
वर्धा, चंद्रपुर में पानी और कोयला की उपलब्धता प्रचुर मात्रा में होने के चलते
ही बिजली के उत्पादन के लिये पॉवर प्लांट जरूर लगाये जा रहे है जिनसे और ज्यादा
बिजली प्रदेश के उन इलाकों में भेजी जा सके जहाँ पर औद्योगिक उत्पादन बड़े पैमाने
पर हो रहा है।
जाँच दल को रंजन कावंडे (प्राध्यापक) एवं
अयूब मियां देशमुख ने बताया कि अकोट में एक मंदिर है जिसकी देख रेख के लिये
हैदराबाद के शासक निजाम की तरफ से आर्थिक मदद दी गई थी। केवल अकोट में ही नहीं
बल्कि अमरावती में श्री शिवाजी एजूकेशन सोसाइटी की स्थापना में जो पहली मदद की गयी
वो निजाम के द्वारा दी गयी थी इसी तरह निजाम ने नांदेड़ में एक गुरूद्वारा की स्थापना
के लिए भी आर्थिक सहयोग दिया था। मंदिरों, गुरूद्वारा और हिन्दुओं द्वारा संचालित
एक शैक्षणिक संस्था को एक मुस्लिम शासक के द्वारा दी गई आर्थिक मदद साम्प्रदायिक
सदभाव के लिये एक बेहतरीन नमूना बन सकती थी लेकिन 90 के दशक से जब नई आर्थिक
नीतियों की शुरूआत की जाती है और यह कहा जाता है कि बाजार अपनी शर्तों के मुताबिक
काम करेगा एवं राज्य बाजार में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा वहीं दूसरी तरफ लगातार
राज्य का अथवा राजनीति का धर्म (साम्प्रदायिकता) के साथ एक गठजोड़ भी बनता है, जिसकी परिणति अकोट एवं देश के दूसरे तमाम इलाकों में साम्प्रदायिक
हिंसा के रूप में सामने आती है।
[1] हसन खां, अ. मुख्तार, अ. लतीफ, अ. मुजम्मिल, अ. मोबीन, अ. मलिक, अ.
अजीज, अ. मुक्तदीर, सरफराज खान, जुलेखां बी, म. हारून, जाकिर हुसैन, कलामून, म.
सिद्दीक, म. आसिफ, सिराजुद्दीन, अ. हमीद, महमूदा खातून, अजमत खां, सलीम खां,
इब्राहीम शा, सै. खुर्शीद।
[2] कबाड़ की दुकान के मालिकों के नाम – मोहम्मद मुजाहिद, अ. अनसार, अ.
मुबारक, अ. राजिद, सै. ज़हूर, सै. अकिल, गणेश गलांडे, अ. खालिफ, अ. आरिफ।
सब्जीमंडी
की दुकान के मालिकों के नाम - असलम शाह,
साबीर शाहा, नासिर खां, प्रताप खलोकार, सुरेश शेंगोकार, भावराव सावरकर, राहुल
सिरसकार, नाज़ीम खां, मोतीलाल गव्हाणे, मुकेश गणोरकार, प्रकाश गवरकार, गणगणे,
विनोद फाटे, अनिस कबिरोद्दीन।
(जाँच दल के सदस्य : अमीर अली अजानी, राजन विरूप, नीलेश झालटे, मोनीश कौशल, शरद जायसवाल।)