Saturday, 6 September 2014

आईसीएचआर के अध्यक्ष का ‘इतिहास बोध’ - अनिल आज़मी


(अनिल आज़मी इलाहबाद में आइसा के सक्रिय साथी हैं. वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगातार लिखते रहते हैं और रिहाई मंच से भी उनका जुड़ाव है.)


     नयी सरकार आने के बाद अकादमी क्षेत्र में सबसे त्वरित और केन्द्रित हमला
इतिहास पर हुआ है क्योंकि शासक और विजेता इतिहास को तलवार-बंदूक से अधिक कारगर
हथियार मानते हैं। किसी भी समाज की मानसिकता बदल देने में इतिहास की बहुत बड़ी
भूमिका होती है, इसलिए हर शासक अपने अनुकूल इतिहास लिखवाने की कोशिश करता है।
मोदी सरकार ने रणनीति के तहत इसकी शुरूआत कर दी है। भारत में इतिहास अनुसंधान
और इतिहास लेखन की सर्वोच्च संस्था भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर)
के चेयरमैन वाई0 सुदर्शन राव की नियुक्ति इस रणनीति का पहला कदम है। कालकाटिया
विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्रमुख रहे सुदर्शन राव ने 2007 में लिखे
गये एक लेख- ‘इण्डियन कास्ट सिस्टमः अ रीअप्रेजल’ के कारण विवाद में रहे। इस
लेख में उन्होंने लिखा है कि ‘‘जाति व्यवस्था प्राचीन काल में बहुत अच्छे ढंग
से कार्य कर रही थी और हमें किसी भी पक्ष से शिकायत नहीं मिलती। इस व्यवस्था
को अक्सर शोषक सामाजिक व्यवस्था कहा जाता है, जिसके जरिये सत्ताधारी वर्ग ने
आर्थिक-सामाजिक आधिपत्य बनाया है। लेकिन वह गलत धारणा है।’’
इतिहास लेखन की वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता प्रदान करने के उद्देश्य से 1972
में स्थापित आईसीएचआर के चेयरमैन नियुक्त होने के बाद वाई0 सुदर्शन राव ने
अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक को एक साक्षात्कार दिया, (21 जुलाई अंक में) जिसमें
इतिहास के प्रति उनकी सोच और विचारधारा प्रस्तुत होती है। इस लेख में आउटलुक
को दिये साक्षात्कार के सारांश को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है-

‘भारतीय परिदृश्य’ में इतिहास-लेखन-
वाई0 सुदर्शन राव का मानना है कि इतिहास का लेखन ‘भारतीय परिदृश्य’ में होना
चाहिए। अब तक का इतिहास-लेखन वामपंथ और पाश्चात् विद्वानों द्वारा किया गया
है। जोकि भ्रामक है।
वस्तुतः किसी भी देश का इतिहास दुनिया के इतिहास का एक हिस्सा होता है। इतिहास
को मुल्क की सीमा रेखाओं में कैद करना मुश्किल ही नहीं बल्कि आने वाली
पीढि़यों के लिए घातक भी होता है। पिछले छः दशकों में इतिहास ने एक विषय के
रूप में उल्लेखनीय प्रगति की है, खास करके ‘विवादित या भ्रामक इतिहास’ का सही
चेहरा उजागर हुआ है। सीड्स आॅफ पीस अन्तर्राष्ट्रीय शिविर जैसी संस्था का उदय
हुआ है ताकि आने वाली पीढि़याँ ‘सही इतिहास’ को जान सकंे। इसी तर्ज पर भारत और
पाकिस्तान के युवा इतिहासकारों ने ‘द हिस्ट्री प्रोजेक्ट’ नाम से एक संस्था
बनायी है जिसका काम है भारत और पाकिस्तान के परस्पर विरोधी इतिहास लेखन को
उजागर करना। ताकि इसे पढ़कर लोगों के भीतर एक प्रक्रिया शुरू हो और कथित रूप
से स्थापित किये उन तथ्यों पर संदेह करना शुरू करें जो उन्हें भ्रामक लगते
हैं। परन्तु आईसीएचआर के निदेशक महोदय ने इतिहास को सीमाओं में कैद कर लेने का
तुगलकी फरमान जारी कर दिया है।इतिहास लेखन को लेकर दक्षिणपंथी विचारधारा की चिंता नयी नहीं है। पूर्व मानव
संसाधन मंत्री रहे डा0 मुरली मनोहर जोशी ने 30 दिसम्बर 2001 में ‘द हिन्दू’
में लिखा कि- ‘‘इस देश को दो प्रकार के आतंकवाद का सामना करना पड़ रहा है। एक
है ‘बौद्धिक आतंकवाद’ जो देश में धीमें जहर की तरह फैला हुआ है, जो वामपंथी
इतिहासकारों द्वारा ‘भारतीय इतिहास के गलत प्रस्तुतीकरण’ की वजह से स्थापित
हुआ है और वह सरहद पार आतंकवाद से कहीं ज्यादा घातक है।’’ वस्तुतः इतिहास के
सबसे करीब पहुँचने वाले इतिहासकार के ऊपर वामपंथ का ठप्पा लगाकर दक्षिणपंथी और
‘राष्ट्रवादी’ लोग इतिहास बोध को दबा देना चाहते हैं, ताकि जिस ‘राष्ट्रवाद’
की आग में वे अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं, उस पर सवाल न खड़ा हो सके।

इतिहास का पुर्नलेखन-
इतिहास के पुर्नलेखन पर पूछे गये एक सवाल के उत्तर में सुदर्शन राव ने कहा कि
‘वह सत्य के फालोवर हैं।’ और ‘सत्य’ सामने आना चाहिए। राव साहब के इस जवाब से
स्पष्ट है कि ‘सत्य’ के नाम पर एक बार फिर से ‘इतिहास का भगवाकरण’ किया
जायेगा। वह पूरी प्रक्रिया हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के कलेवर में हमारे सामने
आयेगी। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से अपनी 385 ‘भारत विजय रैलियों’ मेें
राष्ट्रवाद का नारा बुलंद किया, वह जर्मन राष्ट्रवाद ‘मेरा राष्ट्र सही या गलत
परन्तु सबसे अच्छा’ से रत्ताी भर कम नहीं है। परन्तु इतिहास के लिए यह बेहद
घातक होगा जैसा कि एरिक हाॅब्सबाॅम ने सटीक सुझाया है कि राष्ट्रवाद इतिहास के
लिए अफीम जैसा है।

वस्तुतः इतिहास लेखन फिर से साम्प्रदायिक इतिहास लेखन की तरफ मुड़ रहा है।
जेम्स मिल द्वारा ‘इतिहास विभाजन’ के औचित्य को सुदर्शन राव जी सही साबित करना
चाहते हैं कि प्राचीन भारत (हिन्दूकाल) में भारतीय सभ्यता का स्वर्णिम काल था
और मध्यकालीन भारत (मुस्लिमकाल) राष्ट्र और सभ्यता के विघटन और विध्वंस का काल
था। दक्षिणपंथी विचारधारा इसकी प्रबल समर्थक रही है तभी तो देश के
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद में 9 जून को अभिभाषण में कहा कि- ‘‘कुछ
बातों में बारह सौ सालों की गुलामी हमें परेशान करती है।’’ वह 1200 वर्षों की
गुलामी आखिर किस तरफ इशारा करती है? गौरतलब है कि यह धारणा यह स्थापित करती है
कि 711 ई0 में सिंधु पर अरबों का आक्रमण और उसके बाद ‘तुर्की शासन’ की स्थापना
भारत के लिए गुलामी थी। अब इतिहास पुर्नलेखन के नाम पर फिर से राष्ट्रनायक और
खलनायको को परिभाषित किया जायेगा।

ऐतिहासिक स्रोत बनाम ‘कलेक्टिव मेमोरी’-
प्राचीन इतिहास लेखन में राव के अनुसार अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को प्राथमिकता दी
जायेगी। इतिहास के प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों को ताख पर रखकर अब
किंवदंतियों और गाथाओं को आधार माना जायेगा। एक तरफ इतिहास पुरानी घटनाओं,
वस्तुओं की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए कई वैज्ञानिक उपकरणों व
प्रक्रियाओं से लैस हुआ है, वही दूसरी तरफ भारत के इतिहास शोध के सर्वोच्च
संस्थान के चेयरमैन ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात कर रहे हैं। वस्तुतः ‘कलेक्टिव
मेमोरी’ और कुछ नहीं बल्कि बहुसंख्यकवाद की एक अभिव्यक्ति होगी जो यह स्थापित
करने में सफल होगी कि राजा दशरथ के बाद ‘शब्दभेदी बाण’ दिल्ली के अंतिम
‘हिन्दू शासक’ हेमू और पृथ्वीराज चैहान चलाते थे। साथ ही साथ वह भी प्रमाणित
कर देगी कि मु0 गोरी को पृथ्वीराज ने ‘शब्दभेदी बाण’ से मार गिराया था।
यह सत्य कि इतिहास लेखन में गाथाओं और किवदंतियों की भूमिका को नकारा नहीं जा
सकता है परन्तु जिस ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात सुदर्शन राव जी कर रहे हैं वह
हिन्दुत्व का महिमा मंडन ही है। जिस तरह से ‘जनभावनाओं की संतुष्टि’ के नाम
फांसी की सजा सुनाया जा रहा है, उसकी तरफ अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ के नाम पर
इतिहास को दफन करने की कोशिश की जायेगी।

प्राचीन इतिहास और ‘महाभारत प्रोजेक्ट’-
सुदर्शन राव जी ‘महाभारत प्रोजेक्ट’ नाम एक शोध कार्य किया है और उनका मानना
है कि महाभारत और रामायण दोनों सत्य घटनाओं पर आधारित हैं। इसके लिए बकायदा
तिथि निर्धारण का भी कार्य किया जा रहा है। इन दोनों महाकाव्यों को लेकर एक
इतिहासकार के सामने मुख्यतः दो समस्या होती है- पहला इनकी महाकाव्यों की
पवित्रता और दूसरा आस्था और इतिहास में फर्क न कर पाना। प्रसिद्ध इतिहासकार
रोमिला थापर का मानना है कि ‘‘आज इतिहास को आस्था पर नहीं बल्कि गहन अन्वेषण
पर आधारित होना होगा।’’ परन्तु क्या हम सुदर्शन राव से आस्था से इतर सोचने की
उम्मीद कर सकते हैं, जिन्होंने अपने साक्षात्कार में अपने आप को सिर्फ हिन्दू
ही नहीं कहा बल्कि यह भी जोड़ा कि वे ब्राह्मण भी हैं।
प्रायः कहा जाता है कि भारतीयों में इतिहासबोध बिल्कुल नहीं होता। वस्तुतः
इतिहास बदलावो का एक दस्तावेज है, परन्तु भारतीय इतिहास में वाई0 सुदर्शन राव
सरीखे व्यक्तियों की भरमार रही है जो प्रतिगामी रहे हैं और समाज को स्थिर
बनाये रखने में यकीन रखते हैं। रामायण या महाभारत जैसे महाकाव्य समाज को समझने
का एक स्रोत हो सकता है। परन्तु आँख बंद करके यह मान लेना कि महाभारत या
रामायण के सारे पात्र ऐतिहासिक हैं, गलत ही नहीं बल्कि घातक है। रोमिला थापर
का मानना है, ‘‘यदि आपने तय कर लिया है कि वह राम है जिसने धर्म की स्थापना की
थी, तब आपको सिद्ध करना पड़ेगा कि वह बुद्ध, ईसा और मोहम्मद साहब की तरह ही
ऐतिहासिक रूप से अस्तित्व में था। ‘महाभारत प्रोजेक्ट’ वस्तुतः यही साबित करना
चाहता है ताकि धर्म के आधार पर ही ‘भारतीय गुलामी’ को परिभाषित करते हुए
मुसलमानो और ईसाइयों को बाहरी साबित किया जा सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
ने तो पहले ही घोषित कर रखा है कि भारत हिन्दूओं के लिए ‘सुरक्षित स्थान’
होगा, आखिर इसे कोई तर्क चाहिए ना।
राम की अयोध्या-
अयोध्या पर पूछे गये एक सवाल के जवाब में सुदर्शन राव जी ने कहा कि यदि राम का
जन्म अयोध्या में नहीं हुआ तो कहाँ हुआ? वस्तुतः सुदर्शन राव जी इतिहास के
जरिये अयोध्या को राम की जन्मभूमि बनाने की कवायद में जुड़ जायेगें और भारतीय
जनता पार्टी के घोषणा-पत्र में शामिल राममंदिर मुद्दा का संवैधानिक हल निकालकर
मंदिर निर्माण के सपने को हकीकत में बदलने की पुरजोर कोशिश करेगें।
प्राचीन काल में छुआछूत नहीं थी-
प्राचीन काल का महिमा मण्डन करने वाले सुदर्शन राव ने स्पष्ट कहा है कि
प्राचीन काल में छुआछूत अस्तित्व में नहीं थी। 2007 में लिखे अपने लेख में भी
‘जाति-प्रथा’ को भारतीय संस्कृति का सकारात्मक पक्ष मानते हुए लिखा है कि
प्राचीन काल की जाति व्यवस्था में किसी भी वर्ग को किसी से शिकायत नहीं थी।
यदि सुदर्शन राव के द्वारा जारी ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को सही माना जाये तो कई
सवाल इसके तथ्य को आईना दिखाने के लिए खड़े हो जाते हैं। जैसे- यदि महाभारत
अथवा रामायण के समय छुआछूत नहीं थी तो लक्ष्मण ने शबरी का बेर क्यों नहीं
खाया? तपस्वी रहते हुए भी राम ने शंबूक की हत्या क्यों की? एकलव्य से
निर्लज्जतापूर्वक अंगूठा कैसे और क्यों मांगा गया। गौरतलब है कि अपनी अतीत
ग्रस्तता के वजह से सुदर्शन जी इन सारी गाथाओं को नजर अंदाज कर दिये होगें।
अतीत ग्रस्तता एक सहज प्रवृत्ति है, मुख्यतः असहाय बने अकर्मण्य लोगों की।
दक्षिणपंथी विचारधारा यहीं मार खा जाती है, जब वह ‘स्वर्णिम काल’ की बात करती
है और जब सवाल वर्णव्यवस्था या जातिवाद पर उठ जाता है तो सारा इतिहास बोध
पारलौकिकता और नियतिवाद में तब्दील हो जाता है। जातिभेद के सवाल पर अपने
साक्षात्कार में वाई0 सुदर्शन ने कहा कि विश्वामित्र ने दलित के घर कुत्ते का
मांस खाया था। सुदर्शन राव साहब इसके जरिये यह दिखाना चाहते हैं कि दलित
कुत्ता खाता था, परन्तु क्या उनमें यह हिम्मत है कि आर्यों के गोमांस खाने के
प्रमाणिक तथ्यों को वह स्वीकार करेगें?
इतिहास बनाम धर्म-
इतिहास साक्ष्यों पर आधारित होता है वही धर्म आस्था का विषय है। परन्तु
सुदर्शन राव साहब ने सिर्फ आस्थावान व्यक्ति ही नहीं बल्कि असहिष्णु भी है।
तभी तो सनातन धर्म की बड़ाई करते-करते राव साहब यहाँ तक दावा कर दिया है कि
सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ धर्म है। साथ ही साथ इस्लाम को विध्वंसक धर्म बताया है
कि मध्यकाल में किस तरह से उन्होंने मंदिरो को नुकसान पहुँचाया। इतिहासबोध की
इतनी छिछली जानकारी रखने वाले राव साहब को पता होना चाहिए कि तुर्कों से पहले
भी भारत में हिन्दू शासको ने एक दूसरे के मंदिरों को तोड़ा था, क्योंकि मंदिर
शासक की प्रतिष्ठा हुआ करते थे। अतः यह कहना कि सिर्फ मुसलमानों ने मंदिर
तोड़े यह बचकाना बात है। मध्य काल में मंदिरो का तोड़ा जाना मुख्यतः आर्थिक
कारण था न कि धार्मिक कारण।
खैर 1972 में  स्थापित आईसीएचआर के पहले चेयरमैन प्रो0 रामशरण शर्मा के साथ
इरफान हबीब, सव्यसाची भट्टाचार्य के ‘इतिहासबोध’ को दोराहे पर खड़ा कर दिया
गया है। क्योंकि सुदर्शन राव ने इतिहास की धारा को ‘इतिहास जो है’ से ‘इतिहास
जो हो सकता है’ की तरफ मोड़ने का प्रयास किया है। फिलहाल समाज और सरकारों को
नहीं भूलना चाहिए कि यदि हम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलायेगें तो आने वाला
भविष्य हम पर तोप से गोले दागेगा।

 -अनिल आज़मी  द्वारा मोहम्म्द शुऐब एडवोकेट,
110/46 हरि नाथ बनर्जी स्ट्रीट
लाटूश रोड नया गांव ईस्ट
लखनऊ उत्तर प्रदेश।
मो0 09454292339

Tuesday, 26 August 2014

दलित स्त्रीवाद का नया इलाक़ा : कर्मेन्दु शिशिर


पुस्तक-समीक्षा-

पुस्तक : दलित स्त्रीवाद की आत्मकथात्मक अभिव्यक्ति.
लेखक : राम नरेश राम
नयी किताब, दिल्ली-110032. मूल्य : 195/- रूपये.


(कर्मेन्दु शिशिर उन आलोचकों मे से हैं जो नई पीढ़ी से पर्याप्त आशा रखते हैं और अपनी इसी के चलते वे उन्हें समुचित रूप से अभिप्रेरित करने का धैर्य व साहस रखते हैं। कर्मेन्दु शिशिर ने अपने आलोचकीय कर्म में नवजागरण जैसे विषय पर बेहतरीन काम किया है। इतिहास के द्वन्द्वात्मक पुनर्मूल्यांकन की चेतना और भविष्य निर्मात्री युवा पीढ़ी में विश्वास का यह संयोग उनकी चेतना की समृद्धि की ओर ही इशारा करता है।)


रामनरेश राम उन थोड़े से अधुनातन युवा लेखकों में से हैं, जिनके लेखन की विचारोत्तेजकता उन्हें दूसरों से हिगराती है। अपने समय-समाज के सरोकारों से जुड़े जीवन्त मुद्दों को वे जिस शिद्दत के साथ उकेरते रहे हैं, वह ख़ासतौर से ध्यान आकृष्ट करता है। अभी उनकी छपी पुस्तक दलित स्त्रीवाद की आत्मकथात्मक अभिव्यक्ति दरअसल उनके शोध विनिबन्धक का ही परिष्कृत रूप है। जाहिर है अकादमिक प्रविधि के अनुशासनों की अपनी सीमाएँ भी हैं लेकिन जगह-जगह विश्लेषण और यथार्थ की अंतर्दृष्टि भरी सूझ से वे उसका अतिक्रमण भी करते हैं। उनकी प्रखर वैचारिक, सामाजिक जागरूकता और समकालीन अध्ययन विस्तार पाठक को बाँधे रहती है। कहीं भी आप को अकादमिक ऊब नहीं होती। पढ़ते हुए आप यह सहज महसूस करते हैं कि लेखक उन संकीर्णताओं से मुक्त है, जो अमूमन दलित लेखन की विडम्बनाएँ रही हैं। वैसे दलित या ऐसे तमाम विमर्शों की मूल दिक्कत यह रही है कि ऐसे तमाम अध्ययन स्वायत्त शकल में किए जाते हैं। इस कारण इन विमर्शों पर तेज रोशनी तो जरूर पड़ती है, जिससे कई तरह के तात्कालिक अवसर सध जाते हैं। लेकिन जरूरत समग्रता में रखकर इन विषयों के अध्ययन की है, जिससे ऐतिहासिक विकास क्रम में इसे तमाम सरोकारों के विस्तार में परखा जा सके।
      
     `हिन्दी में अब तक हुए स्त्री-विमर्शों का विश्लेषण करते हुए रामनरेश जी ने उसके अंतर्विरोधों और दिशा वैविध्य की भी चर्चा की है। बल्कि इसके पीछे की मानसिक प्रवृत्ति को परखा है और ऐसा करते हुए दलित स्त्रीवाद को रेखांकित करते  हुए उसके भिन्न सामाजिक यथार्थ को इंगित किया है।  यहाँ यह बात गौर करने वाली है कि ऐसा करते हुए दुराग्रहों के शिकार नहीं होते। जैसे स्त्री के पीछे जाने का यथार्थ दलित गैरदलित दोनों में समान है। मसलन स्त्री-विमर्श के प्रचलित स्वरूप में वे दलित स्त्री जीवन को अलग हिगराते हुए किसी सरलीकरण का सहारा नहीं लेते। बेशक दलित यथार्थ को कुछ बुनियादी सैद्धांतिक समझ और ऐतिहासिक अध्ययन तथा शोध की अपेक्षाएँ बनी रहती हैं, जो शूद्रों और दलित भेद अथवा हिन्दी में दलित अध्ययन की ऐतिहासिकता से जुड़े हैं। प्रेमचन्द, निराला या नागार्जुन की रचनात्मकता से अलग क्षीण ही सही लेकिन नवजागरण काल से ही दलित सवालों का वैचारिक भूगोल शुरू होता है। उसके विस्तार में जाने के लिए शोध, अध्ययन और विचार-विश्लेषण कार्य अभी होना शेष है।
      
     रामनरेश जी की खूबी यह है कि वे हिन्दी या मराठी दलित आत्मकथाओं में दलित स्त्री जीवन की पहचान के लिए इतिवृत्तात्मकता का आसान रास्ता नहीं चुनते। वे दलित स्त्री जीवन के उन बिन्दुओं के धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सरोकारों की पहचान कर उसे विश्लेषित करते हैं। ऐसा करते हुए कई अजानी वीथियाँ भी उद्घाटित होती हैं, जो अक्सर हमसे ओझल रह जाती हैं। ब्राहमणवादी सामाजिक संरचना, धार्मिक रूढ़ियों और परम्पराओं की निरंतरता, लिखित-अलिखित बन्दिशें और परिवार की पारम्परिक अवधारणा और बनावट के बीच स्त्री का शोषण और उपेक्षा इतना सहज होता है कि उसे भी अपनी गुलामी का अहसास तक नहीं होता। इसमें दलित स्त्री का शोषण और गुलामी इतना बहुआयामी होता है कि उसकी कल्पना ही दिल को दहला देती है।
      
     बेशक यह पुस्तक कलेवर में संक्षिप्त होते हुए भी समीक्षात्मक विस्तार की मांग करती है क्योंकि लेखक ने डॉ. अम्बेडकर के पूर्व और बाद में आए परिवर्तनों और प्रभावों की पड़ताल करते हुए जीवन-दर्शन पर भी विचार किया है। इसमें सबसे अधिक उत्सुकता जीवन दर्शन के समाजशास्त्र वाले अध्याय को लेकर होती है। आखिर क्या कारण है कि मराठी की तुलना में हिन्दी क्षेत्र में दलित स्त्री की आत्मकथाओं का अभाव रहा। इस पर विचार करते हुए लेखक ने कई ऐसे सवाल उठाए हैं, संकेत दिए हैं, जिनके विस्तार की जरूरत है। दलित स्त्री जीवन में मुक्ति की अकुलाहट और विद्रोह का ताप भी है। जकड़न की, बन्दिशों की गहरी पीड़ा है। अन्त में कविता और सिनेमा में आए इस विमर्श से संबंधित लेखकीय टिप्पणियाँ पुस्तक को और उपयोगी और विचारोत्तेजक बनाती हैं। सुशीला टाकभौरे की आत्मकथा की समीक्षा और उनसे साक्षात्कार को शामिल कर लेखन ने व्यावहारिक अनुशीलन का जो साक्ष्य रखा है, वह उसके कार्य को एक तरह से पाठकीय बोध को पूर्णता देता है। रामनरेश जी की यह पुस्तक हिन्दी में दलित लेखन के एक पक्ष विशेष के नए इलाक़े से हमें परिचित ही नहीं करती, बल्कि एक नया विस्तार करती है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए।       

Wednesday, 4 June 2014

विकास के खोल में सांप्रदायिक राजनीति




      लहर आते-आते सुनामी बन गई. अभी वह उफनाई हुई ही है. सुनामी जैसी लहरें अपने साथ तबाही का मंजर भी लाती हैं और जाते समय मनुष्य के द्वारा किए गए समस्त प्रयासों को मलबा बना कर छोड़ जाती हैं. 16 वीं लोकसभा के चुनावी परिणाम आने के बाद वाले दिनों में ऐसी तबाहियों को बर्दाश्त करने के लिए जनता को तैयार रहना चाहिए. हालांकि यह खतरा जिस चीज पर सवार है उसे जनमत या बहुमत कहा जा रहा है. जबकि एनडीए द्वारा हासिल इस तथाकथित बहुमत के अलावे वोटों का बड़ा हिस्सा इस बहुमत के खिलाफ है. हाल-ताज में संपन्न इस लोकतांत्रिक नाटक-नौटंकी में जिस तरह के खेल-तमाशे हुए वे छुपे तो नहीं रहे लेकिन वे इस चुनाव में सवाल की शक्ल भी नहीं ले सके. चुनाव कोलोकतंत्र का यज्ञकहा गया और यह बड़ी शर्मनाक बात रही कि करोड़ों लीटर शराब भी इस यज्ञ में हविष्य बनी. एक आंकड़े के अनुसार इस चुनाव में इतनी बड़ी मात्रा में शराब बरामद हुई कि उससे ओलम्पिक में इस्तेमाल होने वाले चार सौ तरण-ताल भरे जा सकते हैं. आयोग के पास यह आंकड़ा शराब की उस मात्रा को लेकर है जो बरामद हुई है और कितनी शराब की मात्रा उदरस्थ हो कर इस लोकतांत्रिक यज्ञ-कर्ताओं के पुण्य में तब्दील हो गई होगी, अनुमान ही लगाया जा सकता है.बड़ी-बड़ी करोड़ी रैलियों की रेलपेल, हाईटेक चुनाव सामग्री के इस्तेमाल,सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और पूंजीवाद के सरगना अमरीका की महंगी चुनावी प्रचार शैली की नक़ल की दृष्टि सेचर्चित यह चुनाव क्यूँ और कैसेयज्ञजैसे पोंगा-पंथी धार्मिक कर्मकांड के प्रतीक से अभिहित किया गया. इस पर भी विचार करने की जरूरत है. जाहिर है ऐसे प्रतीक से इस चुनाव को अभिहित करने के पीछे उस मानसिकता की छाप है जिसका प्रचार आरएसएस जैसे संगठन लगातार करते रहे हैं. नरेंद्र मोदी द्वारा संसद की सीढ़ियों पर मत्था टेकना इस आशंका को बल देता है कि आने वाले दिनों में कहीं संसद को पूर्णतयामंदिर बना दिया जाए. पहले भी बीजेपी के नेतृत्व में बनी सरकारें इस तरह की हरकतें करती रही हैं अभी भी बहुत से लोगों को यह बात याद होगी कि एक बार उमा भारती द्वारा मध्य प्रदेश की विधान सभा में बलात्कारी बापू के प्रवचन सरकारी खर्चे पर करवाये गए थे. मीडिया में मोदी के संसदीय मत्था-टेक को बड़े ही भावुक तरीके से पेश किया गया और आडवानी के पैर छूते ही मोदी के संस्कारवान होने का सर्टिफिकेट भी जारी कर दिया गया मानो जूतम-पैजार वाली संसद को ऐसे ही संस्कारी शिशु मंदिरिया बच्चे की प्रबल आवश्यकता थी जो मोदी के आते ही पूरी होनी शुरू हो गई. दरअसल मोदी की ये सारी हरकतें लंतरानी से अधिक नहीं हैं. मोदी अपनी इन हरकतों से हिंदुत्व की लहर में बह रहे तथाकथित बहुमत तक यह संदेश पहुँचाना चाहते हैं कि उन्हों ने बिलकुल सही व्यक्ति का चुनाव किया है. कुल मिला कर यह आदर्श हिंदू की छवि बनाने की कोशिश है. छवि निर्माण की इस योजना में शामिल एक खबरिया चैनल (न्यूज 24) ने तो काफी जोशोखरोश के साथ एक वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री) 16 मई, 2014को मोदी और उनकी मां पर केन्द्रित करके दिखाई. जिसमें चुनावी विजय के बाद मोदी द्वारा अपनी मां से आशीर्वाद लेने गए थे और बिलकुल उन्हें शिशु मंदिरों में बच्चों को पढाये जाने वाले पाठमां का आज्ञाकारी बालकजैसा प्रस्तुत किया गया. इस वृत्तचित्र में ममता और मातृभूमि को एकाकार वंदेमातरम का पूरा रूपक ही रच दिया गया तथा मोदी के पक्ष में उत्पन्न राजनितिक परिस्थिति को भगवा इमोशनल टच देने की कोशिश की गई. वस्तुत: यह सब विकास पुरुष की लीला है. चूँकि ये लीलाएं हैं अत: इनका मिथ्यात्व स्पष्ट है. आखिर विकास के नारे के साथ सोलहवीं लोकसभा के परिदृश्य पर आने वाले विकास-पुरुष को इस लीला की जरुरत ही क्या है जब विकास रूपी मोहपाश उसका सिद्ध अस्त्र हो? जरुरत है...क्योंकि उसके पास विकास का कोई सिद्ध अस्त्र नहीं है. इसीलिए उसे इस छल-छद्म की जरुरत है.यदि आप मोदी के पूरे चुनाव अभियान पर गौर करें तो पाएंगे कि उसमें ऐसी भाषा और रणनीतियों का इस्तेमाल किया गया जिसे प्रच्छन्न तरीके से ध्रुवीकरण संभव हो सके. आखिरभारत विजय’, ‘हर-हर मोदीजैसे नारे क्या इंगित करते हैं.भारत विजय, हर-हर, ‘विजय निष्कंटक यज्ञऔर चुनाव के दौरान अधिकांशत: मोदी द्वारा पीले-नारंगी वस्त्र या उसे मिलते-जुलते रंग वाले वस्त्रों का इस्तेमाल आदि...आदि सबमें एक महीन अंत:सूत्र निहित है और इस सूत्र की पहचान कठिन नहीं है.