जनकवि विद्रोही हमारे बीच आज शरीरी रूप से अशेष
हो गए. पर अपनी रचनाओं, अपनी चिंताओं और जनता के मोर्चे पर डटे रहने की जिस चेतना
और उसकी क्रियात्मता को उन्होंने प्रस्तुत किया वह दुर्लभतम है. चेतना को,
विचारधारा को किस तरह व्यवहार्य बनाया जाय यह विद्रोही जी के जीवन से सीखा जा सकता
है. उन्होंने अपनी रचनाओं के साथ-साथ अपनी जीवन शैली से भी यह पुरजोर तरीके
स्थापित किया क्रांति की अवधारणाएँ महज यूटोपिया नहीं है. क्रांतिकारी मार्क्सवादी
दर्शन में जिस निजी संपत्ति के खात्मे का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. उसे
विद्रोही जी ने व्यष्टिगत रूप से अपने जीवन में उदहारण स्वरूप चरितार्थ किया.
जे.न.यू. का पूरा परिसर उनका घर था. और उस परिसर का सारा आकाश उनकी छत थी. निजी
स्तर पर कुछ भी संग्रह न करने का भाव, हम जैसे मध्यम वर्गीय लोगों के मन में सदा ईर्ष्या
पैदा करता था. अभी 30 नवम्बर को जे.न.यू. परिसर के गंगा ढाबा पर बैठ कर साथियों के साथ गप्पें लग ही रही थीं तभी
विद्रोही जी वहां आ पहुंचे और चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की कारगुजारियों का इतना
बढ़िया विश्लेषण किया कि मुंह से बेसाख्ता निकल पड़ा...लाजवाब! वाकई उन्होंने
चन्द्रगुप्त और उसके राजपाट की कलुषता, दुर्भाग्य से जिसे स्वर्णकाल कहा जाता है, का
बेहतरीन विश्लेषण किया था. ऐसा कि गुप्त काल की तथाकथित ‘स्वर्णमयता’ के धुर्रे उड़
गए.
विद्रोही जी आज, अपने अंत समय में भी मोर्चे पर
ही थे. आज, देश भर के छात्र-छात्राएं दिल्ली के जंतर-मंतर पर केंद्र सरकार की
छात्र-विरोधी नीतियों के खिलाफ जब गोलबंदी पर थे, तब करीब 2 बजे विद्रोही जी इन
जुझारू युवाओं को अपना समर्थन देने के लिए वहां पहुंचे थे और वहीं आंदोलन के स्थल
पर ही वे सीने में दर्द की शिकायत के बाद गिर पड़े. वाकई, इसमें शक नहीं वे एक
जनकवि थे- जो जन के लिए ही जीता है और जन के लिए ही मरता है. अवध के सुलतानपुर
जिले का निवासी होने के नाते उनके पास अवधी की लोक संस्कृति सम्बंधी मौखिक साहित्यिक
परंपरा की दुर्लभ स्मृति थी. जिस तरह फैज के बारे में कुछ लोगों का कहना है कि शायरी
से सम्बंधित फैज़ के काव्यशास्त्रीय विचार उनके साथ ही चले गए क्योंकि उन्होंने उसे
कभी दर्ज ही नहीं किया. ठीक उसी तरह हमने विद्रोही जी की वह ‘अवधी की लोक संस्कृति
सम्बंधी मौखिक साहित्यिक परंपरा की दुर्लभ स्मृति’ भी उनके साथ खो दी. यह जानते
हुए कि इस नश्वर शरीर की कोई दरा नहीं; हम वह सब रिकार्ड न कर सके. पर जनता के स्वप्नों
का यह कवि हमारे मध्य इतनी जल्दी अशेष हो जाएगा..यह अप्रत्याशित है!
विद्रोही जी ने अपने द्वारा की गई किसी रचना को
कभी भी छपवाने की कोशिश नहीं की. जो कुछ भी प्रकाशित हो पाया, वह सब उनके चाहने
वालों की दुर्धर्ष प्रेमिल जिद के कारण. कभी-कभी ख्याल आता है कि विद्रोही जी ने खुद
ही अपनी रचनाओं को स्याही से पन्नों पर क्यों नहीं उतारा! क्या इसीलिए कि उसकी
रचनाएं जन के मुख में विराजने के लिए बनी हैं...नारे की तरह! क्या नारे कभी छपते
हैं! नहीं...वे तो ‘पुकारती हुई पुकार’ होते है. शमशेर भी तो कहते हैं- दे कर सीधा
नारा कोई मुझे पुकारा.
हम आदरणीय विद्रोही जी को अपना क्रांतिकारी सलाम
पेश करते हैं.

No comments:
Post a Comment